नोएडा: बेसमेंट निर्माण के लिए खोदे गए खुले गड्ढे ने एक हंसती–खेलती जिंदगी छीन ली। सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की डूबकर हुई मौत ने प्रशासनिक व्यवस्था, बिल्डर की जिम्मेदारी और बचाव तंत्र की तैयारियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद पिता राजकुमार मेहता का दर्द छलक पड़ा—“थोड़ा-सा भी सहारा मिल जाता तो मेरा बेटा आज जिंदा होता।”
शुक्रवार देर रात युवराज की कार टूटी बाउंड्रीवॉल पार कर पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, युवराज करीब ढाई घंटे तक मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाकर मदद के लिए चिल्लाते रहे। आसपास भीड़ जुटी रही, लेकिन कोई उन्हें बचाने पानी में नहीं उतरा। कुछ लोग वीडियो बनाते रहे, पर समय रहते ठोस पहल नहीं हो सकी।
पिता का आरोप है कि बचाव कार्य बेहद देर से शुरू हुआ। रात 12 बजे हादसा हुआ, लेकिन प्रभावी रेस्क्यू सुबह करीब छह बजे शुरू किया गया। मौके पर न तो प्रशिक्षित तैराक थे, न बोट या जरूरी उपकरण। राजकुमार मेहता ने कहा, “मेरे बेटे की आवाज देर रात ढाई बजे तक सुनाई दे रही थी, फिर सब खत्म हो गया। यह सीधी-सीधी लापरवाही है।”
स्थानीय निवासी मुनेद्र, जो घटना के वक्त वहीं से गुजर रहे थे, ने बताया कि युवराज मदद के लिए गुहार लगा रहे थे, लेकिन पुलिस ने पानी ठंडा होने और अंदर सरिया होने का हवाला देकर उतरने से मना कर दिया। बाद में उन्होंने खुद रस्सी बांधकर पानी में उतरने की कोशिश की, मगर तब तक काफी देर हो चुकी थी।
मामले में रियल एस्टेट कंपनी एमएजे विशटाउन प्लैनर लिमिटेड और लोटस ग्रैन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि निर्माण स्थल पर सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं थे—न चेतावनी बोर्ड, न मजबूत बैरिकेडिंग, न पर्याप्त रोशनी।
हादसे के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया। नोएडा ट्रैफिक सेल के जूनियर इंजीनियर नवीन कुमार को बर्खास्त कर दिया गया है। नोएडा अथॉरिटी के सीईओ ने बिल्डर के आवंटन और निर्माण कार्य की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। क्षेत्र में ट्रैफिक और सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए हैं।
हालांकि, घटना के दो दिन बाद रविवार को मौके पर बैरिकेडिंग कराई गई, जिसे स्थानीय लोगों ने “देर से जागी व्यवस्था” करार दिया। नोएडा पुलिस के जॉइंट कमिश्नर डॉ. राजीव मिश्रा का कहना है कि सूचना मिलते ही पुलिस और फायर विभाग की टीम पहुंच गई थी, लेकिन घना कोहरा और जीरो विजिबिलिटी के कारण रेस्क्यू में कठिनाई आई।
यह हादसा केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि उस लापरवाह व्यवस्था का आईना है, जहां विकास के नाम पर सुरक्षा को हाशिये पर डाल दिया जाता है। सवाल अब भी वही है—क्या किसी और की जान जाने के बाद ही सिस्टम जागेगा?